वेश्याओं की ये कहानी रुला देगी,कहा-हमसे बेहतर है कौव्वों की दुनिया,रात में शिकार पर नहीं निकलते

New Delhi: दोपहर ही गुनगुनी धूप है। गंदी सीढ़ियों से होता हुआ मैं तीसरी मंज़िल पर पहुंचा। यहां किसी जंग खाए ट्रंक नुमा कमरे में अपराजिता लेटी हैं। टीवी पर पुराने फिल्मी गाने चल रहे हैं। मसलन, लिखे जो ख़त तुझे जो तेरी याद में…हज़ारों रंग के सितारे बन गए।जीबी रोड की चौड़ी गली में धंधे का वक्त शुरू होने वाला है लेकिन उनका धंधा मंदा पड़ा चुका है। उन्हें अब मर्दों के सामने पेश नहीं होना पड़ता। ज़्यादातर वक़्त वह अपने कमरे में सिमटी रहती हैं। दरअसल वह बेहद तेज़ी से बूढ़ी हो रही हैं।

दिन, तारीख़ या साल याद नहीं, जब वह बंगाल से अगवा हुईं। बस इतनी स्मृति है कि स्कूल से घर लौट रही थी। एक औरत समेत तीन मर्दों ने अचानक मुंह दबा दिया। चीखने की भरसक कोशिश की लेकिन नाक पर रुमाल रखे जाने के बाद बेहोश हो गई। कुछ साल पहले तक वह धंधे में रमी हुई थीं। गुलज़ार शामों में कई कद्रदान अपराजिता का भी नाम लेकर जीबी रोड के कोठे तक जाते थे। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वह अपनी ढलती उम्र पर काबू नहीं कर पाईं। अब नशे की आदी हैं।

अपराजिता उम्र की उस चौखट पर पहुंच चुकी हैं जहां लिपिस्टिक की लाली भी कामुकता नहीं जगा पाती। चेहरे की उदासी ग्राहक फौरन ताड़ लेते हैं। हर किसी को ‘नया माल’ चाहिए। गोरी, कड़क और छरहरी। आखिर रुपयों का सवाल है। सालभर पहले तक ख़ुद को जवान मानकर वह अपने मन को बहलाती रही थीं। हालांकि अब इस भ्रम से बाहर आ चुकी हैं। आमदनी कोई नहीं है। फुटपाथ पर बिकने वाली सस्ती लिपिस्टिक ख़रीदने से पहले एक बार सोचना पड़ता है।

वह कहती हैं कि जवानी का दौर बेहद अहम और ऊंचा होता है लेकिन इसी उम्र में इंसान सबसे नीचे भी गिरा करता है। मेरे साथ सोने के लिए बुढ्ढे कभी-कभार आते थे। उनकी मजबूरियां भी हो सकती हैं। लेकिन जिनकी ख़ूबसूरत बीवियां होती हैं, वे इस बजबजाते कोठों से क्या हासिल करना चाहते हैं।

ऐसी जाने कितनी बातें गिनवाकर अपराजिता ने भीतर का गुबार निकाल दिया है। शांत और आत्मविश्वास से भरी दिख रही हैं। वह कहती हैं कि मेरे बुढ़ापे को मेरी कमज़ोरी नहीं समझा जाए। ढलता सूरज कमज़ोरी नहीं अनुभव का प्रतीक होता है। मर्दों के हर तिलिस्म और जाल की काट उन्हें पता है। उन्होंने उन्हीं के बीच ज़िंदगी काटी है और उनकी हर कमज़ोर नब्ज़ समझती हैं।

खिड़की से झांकती अपराजिता कहती हैं, ‘कौव्वों की दुनिया हमसे बेहतर है। दिनभर कांव-कांव किया करते हैं। काले-गोरे का फर्क नहीं। चेहरा चमकाने वाली क्रीमों पर खर्च की झंझट नहीं। कहीं से कुछ भी खा लिया और उड़ते फिरे। शाम ढली तो वापस अपने घोसले में। कौव्वों की दुनिया हमसे बेहतर है। वे रात में शिकार पर नहीं निकलते।

अपराजिता के बगल वाला कमरा रजनी का है। कई बार ग्राहक उन्हें अपने साथ लेकर जाते हैं, फिर घर से बाहर से ही ऑटो या डीटीसी की बस करवा देते हैं। रजनी ऐसे ही एक मर्द के पास से होकर लौटी हैं। उम्र तकरीबन 30 के आसपास। रंग सुनहरार, नयन-नक्श कुछ ख़ास नहीं लेकिन चेहरे पर नमक बेशुमार। बाल का जूड़ा बांधती हुई रजनी भीतर आती हैं। उन्हें देखते ही अपराजिता के चेहरे पर गज़ब की रौनक। दरअसल रजनी कभी-कभार अपराजिता को रुपए देती हैं जिसका हिसाब-किताब नहीं रखतीं। अपराजिता बोली कि कुछ खा ले…हल चलाकर आई है…रजनी हंस पड़ी और मुझे कनखियों से देखते हुए आगे बढ़ गई।

रजनी जीबी रोड के कोठे पर ही जवान हुई हैं। उन्होंने अपराजिता की ऊंचाई देखी है और मौजूदा दिनों की गवाह बन रही हैं। उनमें कोई हवस नहीं है, इसलिए जब भी मौका मिलता है, अपराजिता के पर्स में कुछ रुपए डाल देती हैं। वह उन वेश्याओं जैसा बर्ताव बिल्कुल नहीं करतीं जो अपराजिता पर हंसती हैं, उनका मज़ाक बनाती हैं। दरअसल रजनी को अपराजिता से हमदर्दी है। वह जानती कि वक्त से बढ़कर कोई नहीं। अपराजिता वक्त की मरीज़ है, उसे भी यह दिन देखना है।

लौटकर वापस आई रजनी कहती हैं ‘खेत भी हम, खाद भी हम। किसान भी और बैल भी हम। भूख नहीं लगी है। भूख तो उनको लगी है, हम तो खुद ही खाना हैं। अपराजिता ठंडी पड़ चुकी है। रजनी ने यह भांप लिया। उनकी नज़रें मैली दीवार पर गड़ी हुई हैं। इस तरह कि जैसे मैली दीवार उनकी दुनिया का गलीज़ दस्तावेज हैं। वह अपनी सुर्ख लाल गड़ी हुई नज़रों से दीवार को फोड़ देना चाहती हैं।

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