पैदा होने पर परिवार ने कहा बोझ,बुलंद हौसले से बनीं देश की पहली महिला,जो बनी बच्चों की डॉक्टर

New Delhi: ये उस वक्त की बात है जिस समय  नौकरी तो दूर लोग शिक्षा से भी काफी दूर रहते थे। उन दिनों लड़कियां क्या लड़के भी शिक्षा के लिए जागरूक नहीं थे। ऐसे वक्त में जब लड़कियों को चार दीवारी से निकलने नहीं दिया जाता था, ऐसे वक्त में एक बेटी ने अपनी पढ़ाई के लिए जो संघर्ष किया वह काबिलेतारीफ है। सर्जरी के क्षेत्र में देश की सर्वोच्च उपाधि ‘एमसीएच’ हासिल करने वाली देश की पहली महिला बाल चिकित्सक सर्जन, किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी की पहली महिला कुलपति, आगरा मेडिकल कॉलेज की पहली छात्रा, जिसने जनरल सर्जरी में पढ़ाई की। उनका नाम है पद्मश्री प्रो. सरोज चूड़ामणि गोपाल, जिन्होंने काशी ही नहीं पूरे देश में शोहरत कमाई है।   

प्रो. सरोज चूड़ामणि का जन्म मथुरा के एक गांव में  साल 1944 में हुआ था। उन्होंने बताया कि उनके पिता प्लाटून कमांडर थे। जन्म के समय प्रो. सरोज के ताऊ जी ने उनके पिता को लेटर लिखा था। उन्होंने लेटर में लिखा था- मुझे बताते हुए दुख हो रहा है कि तुम्हारे लिए तुम्हारे घर में जन्मी बेटी  किसी बोझ से कम नहीं है। इसके बाद प्रो. सरोज के पिता ने भगवान की पूजा की और कहा कि मैं अपनी बेटी का स्वागत करता हूं। वो दिन सरोज की जिंदगी के लिए किसी तोहफे से कम नहीं था।

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75 साल की उम्र की प्रो. गोपाल आज भी बतौर डिस्टिंग्विस्ड प्रोफेसर बीएचयू के मेडिकल छात्रों को पढ़ाती हैं और जोश-कर्मठता ऐसी कि आधे उम्र के लोग भी मात खा जाएं। प्रो. चूड़ामणि के उपलब्धियों भरे इस सफर के पीछे संघर्षों की लंबी दास्तान है। ये सफर उनके लिए कतई आसान नहीं था। माता-पिता के सहयोग से हर मुश्किल को पार करते हुए अपने सपने को पूरा किया।  वह कहती हैं कि आज परिस्थितियां बदलने के बाद भी महिलाएं समानता के लिए लड़ रही हैं। महिलाओं को शिक्षित होना बहुत जरूरी है और इसके लिए उनके घरवालों को आगे आना चाहिए।

प्रो.  सरोज बताती हैं कि डॉक्टर बनने का जुनून इस कदर था कि एमबीबीएस में एडमिशन के लिए पांच दिनों तक खाना-पीना छोड़ दिया था।फिर आगरा के मेडिकल कॉलेज में जनरल सर्जरी में दाखिला तो ले लिया लेकिन लड़कों के बीच अकेली लड़की होने की वजह से परेशानियां कदम-कदम पर थीं, ऐसा एक वक्त नहीं था जब मुझे कोई परेशानी ना हुई हों । लड़की होकर जनरल सर्जरी लेने पर प्रोफेसरों ने भी साथ नहीं दिया। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। अपने अधिकार को पाने के लिए उन्हें कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाना पड़ा। इसके बाद जब वे सर्जन बन गई तब उनके पति डा. सिद्ध गोपाल ने भी उनका बहुत साथ निभाया।

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